Showing posts with label साहित्यकार. Show all posts
Showing posts with label साहित्यकार. Show all posts

Tuesday, June 10, 2025

हाईस्कूल के छात्र हो, अंग्रेजी में हंसो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कोटा शिवराम कारंत कन्नड़ भाषा के विख्यात साहित्यकार थे। उन्होंने कन्नड़ भाषा में कई उपन्यास और नाटक लिखे जिसे कन्नड़ साहित्य की अमूल्य निधि माना जाता है। उन्हें साहित्य में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। कारंत का जन्म 10 अक्टूबर 1902 में कर्नाटक के उडूपी जिले में हुआ था। उन्होंने बाइस साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया। वह अपनी मातृभाषा कन्नड़ से बहुत प्रेम करते थे। 

वह प्रकृतिवादी भी थे। युवावस्था में ही कांग्रेस में शामिल हो जाने के कारण वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। बात उन दिनों की है, जब वह हाईस्कूल में पढ़ते थे। अंग्रेजों द्वारा स्थापित स्कूल के प्रिंसिपल ने एक नियम बना रखा था कि जो भी अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषा में बातचीत करता था, तो वह नाराज होते थे। 

वह चाहते थे कि सभी बच्चों का अंग्रेजी पर बेहतरीन पकड़ हो। जिसे भी वह कन्नड़ में बातचीत करते देखते थे, प्रिंसिपल सजा देते थे। यह बात कारंत को बहुत नागवार लगती थी। एक दिन की बात है। प्रिंसिपल कहीं गए हुए थे। कक्षा में कारंत ने कोई मजाकिया बात कही जिसे सुनते ही सारे छात्र हंस पड़े। 

कारंत ने हंसने वाले लड़कों को डांटते हुए कहा कि मूर्खों, तुम कन्नड़ में कैसे हंस सकते हो? तुम हाईस्कूल के विद्यार्थी हो, तुम्हें अंग्रेजी में हंसना चाहिए। संयोग से उसी समय प्रिंसिपल काम से लौट आए थे और कक्षा के बाहर खड़े होकर वह कारंत की बात सुन रहे थे। कारंत की बात सुनकर वह समझ गए कि वह क्या कहना चाहता है। इसके बाद उन्होंने अपनी यह आदत छोड़ दी। 

उन्होंने अपने सैंतालीस उपन्यासों के अलावा इकतीस नाटक, चार लघु कहानी संग्रह, निबंध और रेखाचित्रों की छह पुस्तकें , कला पर तेरह पुस्तकें, कविताओं के दो खंड, नौ विश्वकोश और विभिन्न मुद्दों पर सौ से अधिक लेख लिखे।

Sunday, June 8, 2025

मैं जनता की राय साहिबी स्वीकार कर चुका हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

हिंदी और उर्दू के सबसे लोकप्रिय साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। हिंदी साहित्य में कथा सम्राट कहकर उन्हें बड़े आदर के साथ याद किया जाता है। प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी जिले (उत्तर प्रदेश) के लमही गाँव में एक कायस्थ परिवार में हुआ था। प्रेमचंद को प्रगतिशील साहित्यकार माना जाता है। उनकी कई कहानियां और उपन्यास तात्कालिक समाज का आईना हैं। उन्होंने जीवन में कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। 

यही वजह है कि वह आजीवन कष्ट का सामना करते रहे। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों का एक बहुत बड़ा पाठक समुदाय था। उनकी इस लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर विलियम मैल्कम हेली ने उन्हें राय साहब की उपाधि से विभूषित करने का फैसला किया। गवर्नर हेली ने इसके लिए बाकायदा एक पत्र मुंशी प्रेमचंद को भेजा। 

पत्र पाने के बाद भी मुंशी प्रेमचंद इसकी किसी से चर्चा नहीं की। यह बात किसी तरह उनकी पत्नी को पता चल गई। उन्होंने प्रेमचंद से पूछा कि रायसाहबी के बदले कुछ देंगे भी कि खाली तमगा पकड़ा देंगे। प्रेमचंद की पत्नी का मतलब धन से था। प्रेमचंद अपनी पत्नी की बात सुनकर सारा माजरा समझ गए, लेकिन उन्होंने कहा कि मैं यह उपाधि नहीं ले सकता हूं। 

प्रेमचंद ने गवर्नर हेली को पत्र का जवाब देते हुए लिखा कि मैं यह उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता हूं क्योंकि मैं जनता की रायसाहबी तो स्वीकार कर चुका हूं तो ब्रिटिश हुकूमत की रायसाहबी कैसे स्वीकार कर सकता हूं। उनका यह जवाब सुनकर गवर्नर विलियम मैल्कम हेली आश्चर्यचकित रह गए। एक बार मिलने पर हेली ने मुंशी प्रेमचंद को सादर नमन किया।

Saturday, May 3, 2025

रूस के महान साहित्यकार मैक्सिम गोर्की

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मैक्सिम गोर्की रूसी भाषा के ही नहीं, दुनिया की सभी भाषाओं में पढ़े गए।  उनका विश्वप्रसिद्ध उपन्यास मां आज भी बड़े चाव के साथ पढ़ी जाती है। यह उपन्यास उन्होंने 1906 में लिखा था जिसमें जारशाही और मजदूर वर्ग का संघर्ष बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। 

मैक्सिम गोर्की का जन्म 28 मार्च 1868 को निज्नी नोवगरद नगर में हुआ था। उनके पिता बढ़ई का काम करते थे। गोर्की को पढ़ने का शौक बचपन से ही रहा है। वह अपने पिता के कामों में हाथ बंटाने के साथ-साथ पढ़ते-लिखते रहते थे। अगर उन्हें पता चल जाता कि फलां आदमी के पास कोई अच्छी पुस्तक है, तो वह उस व्यक्ति से पुस्तक मांगकर लाते और पढ़कर वापस कर देते। 

यदि पुस्तक पढ़ने के बदले उन्हें उसके यहां मजदूरी करनी पड़ती तो वह भी उन्हें मंजूर था। उनकी पढ़ने के प्रति जुनून देखकर लोग उन्हें पागल समझते थे। धीरे-धीरे उन्होंने पढ़ने के साथ-साथ लिखना भी शुरू किया। वह अपनी रचनाओं को उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में भेजते रहते थे। सन 1892 एक दिन वह चौकीदारी करके लौट रहे थे, तो उन्होंने अखबार बेचने वाले को देखा, तो एक अखबार खरीद लिया। उसमें उनकी पहली लघुकथा मकर छुद्रा प्रकाशित हुई थी। इसके बाद तो उन्होंने जैसे पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

कुछ बड़े होने पर वह मार्क्सवादियों के संपर्क में आए। वह रूस के क्रांतिकारी संगठनों में काम करने लगे। जारशाही ने उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। रूसी जन जीवन का जितना विस्तार से वर्णन गोर्की ने किया है, उतना शायद दूसरे साहित्यकार ने नहीं किया। रूसी जीवन का संपूर्ण परिचय उनकी आत्मकथा मेरा बचपन, जनता के बीच और मेरे विश्वविद्यालय को पढ़ने से ही मिल जाता है।